CTET के सभी वैज्ञानिकों के सिद्धांत

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जीन पियाजे (Jean Piaget)

सिद्धांत का नाम: संज्ञानात्मक विकास का सिद्धांत (Theory of Cognitive Development) 


मुख्य बिंदु: इन्होंने बच्चे को 'सक्रिय अन्वेषक' (Active Explorer) और 'नन्हें वैज्ञानिक' कहा है। इनके सिद्धांत की 4 मुख्य अवस्थाएँ हैं:


संवेदी-गामक अवस्था (Sensory Motor Stage: 0-2 वर्ष)


पूर्व-संक्रियात्मक अवस्था (Pre-Operational Stage: 2-7 वर्ष)


मूर्त-संक्रियात्मक अवस्था (Concrete Operational Stage: 7-11 वर्ष)


औपचारिक/अमूर्त संक्रियात्मक अवस्था (Formal Operational Stage: 11 वर्ष से आगे) 


महत्वपूर्ण शब्द: आत्मसातीकरण (Assimilation), समायोजन (Accommodation), साम्यधारण (Equilibration), स्कीमा (Schema)। 


2. लेव वायगोत्स्की (Lev Vygotsky)

सिद्धांत का नाम: सामाजिक-सांस्कृतिक विकास का सिद्धांत (Socio-Cultural Learning Theory)


मुख्य बिंदु: बालक का विकास समाज और संस्कृति के बीच अंतःक्रिया (Interaction) से होता है। 


महत्वपूर्ण शब्द:


ZPD (Zone of Proximal Development - समीपस्थ विकास का क्षेत्र)


Scaffolding (पाड़/ढांचा/मचान - बड़ों द्वारा दी जाने वाली अस्थायी मदद)


MKO (More Knowledgeable Other - अधिक ज्ञानवान अन्य)


Private Speech (निजी वाक/आंतरिक भाषण - बच्चे खुद के कार्यों को दिशा देने के लिए बोलते हैं) 


3. लॉरेंस कोहलबर्ग (Lawrence Kohlberg)

सिद्धांत का नाम: नैतिक विकास का सिद्धांत (Theory of Moral Development) 


मुख्य बिंदु: इन्होंने नैतिकता के विकास के 3 स्तर (Levels) और 6 अवस्थाएँ (Stages) बताई हैं:


पूर्व-पारंपरिक स्तर (Pre-Conventional Level): सजा और आज्ञाकारिता, आत्मकेंद्रित निर्णय (जैसे को तैसा)।


पारंपरिक स्तर (Conventional Level): अच्छा लड़का/अच्छी लड़की अभिविन्यास, कानून और व्यवस्था।


उत्तर-पारंपरिक स्तर (Post-Conventional Level): सामाजिक अनुबंध, सार्वभौमिक नैतिक सिद्धांत। 


महत्वपूर्ण शब्द: नैतिक दुविधा (Moral Dilemma - हिंज की कहानी), नैतिक तर्कणा (Moral Reasoning)। 


कोहलबर्ग के नैतिक विकास के तीन स्तर और छह चरण


पूर्व-परंपरागत स्तर (Pre-conventional Morality - लगभग 4 से 10 वर्ष)


चरण 1: दंड और आज्ञाकारिता (Obedience and Punishment): बच्चा डर से नियम मानता है ताकि उसे सजा न मिले।


चरण 2: अहंकार या व्यक्तिगत लाभ (Individualism and Exchange): बच्चे का व्यवहार अपने फायदे या "जैसी करनी वैसी भरनी" के सिद्धांत पर चलता है। 


पारंपरिक स्तर (Conventional Morality - लगभग 10 से 13 वर्ष)


चरण 3: अच्छा लड़का/अच्छी लड़की (Good Interpersonal Relationships): दूसरों से स्वीकृति पाने और सामाजिक तारीफ के लिए काम करना।


चरण 4: कानून और व्यवस्था (Authority and Social Order): समाज के नियमों, कर्तव्यों और कानून का पालन करना जरूरी समझना। 


उत्तर-परंपरागत स्तर (Post-conventional Morality - किशोरावस्था से वयस्कता)


चरण 5: सामाजिक अनुबंधन (Social Contract): व्यक्तिगत अधिकारों और लोकतांत्रिक ढंग से तय किए गए नियमों को मानना।


चरण 6: सार्वभौमिक नैतिक सिद्धांत (Universal Ethical Principles): अपने अंतर्मन के न्याय, मानवीय मूल्यों और सही सिद्धांतों के आधार पर निर्णय लेना



4. हावर्ड गार्डनर (Howard Gardner)

सिद्धांत का नाम: बहु-बुद्धि का सिद्धांत (Theory of Multiple Intelligences) 


मुख्य बिंदु: बुद्धि कोई एक तत्व नहीं है, बल्कि इसके कई प्रकार होते हैं। इन्होंने मुख्य रूप से 8 प्रकार की बुद्धि बताई है:


भाषाई बुद्धि (Linguistic), तार्किक-गणितीय (Logical-Mathematical), स्थानिक (Spatial), शारीरिक-गतिसंवेदी (Bodily-Kinesthetic), संगीतात्मक (Musical), प्रकृतिवादी (Naturalistic)।


अंतरावैयक्तिक (Intrapersonal): खुद की भावनाओं को समझना।


अंतरवैयक्तिक (Interpersonal): दूसरों की भावनाओं और व्यवहार को समझना। 


5. नोआम चोमस्की (Noam Chomsky)

सिद्धांत का नाम: भाषा विकास का सिद्धांत (Language Development Theory)


मुख्य बिंदु: बच्चों में भाषा सीखने की क्षमता जन्मजात (Innate) होती है।


महत्वपूर्ण शब्द:


LAD (Language Acquisition Device - भाषा अधिग्रहण यंत्र): मानव मस्तिष्क में एक जन्मजात क्षमता होती है।


सार्वभौमिक व्याकरण (Universal Grammar)।


6. बी. एफ. स्किनर (B.F. Skinner)

सिद्धांत का नाम: क्रिया प्रसूत अनुबंधन का सिद्धांत (Operant Conditioning Theory)


मुख्य बिंदु: भाषा और व्यवहार अनुकरण (Imitation) और सुदृढ़ीकरण/पुनर्बलन (Reinforcement) के माध्यम से सीखे जाते हैं।


7. इवान पावलोव (Ivan Pavlov)

सिद्धांत का नाम: शास्त्रीय अनुबंधन का सिद्धांत (Classical Conditioning Theory)


मुख्य बिंदु: उद्दीपक (Stimulus) और अनुक्रिया (Response) के बीच संबंध बनना। (कुत्ते पर किया गया प्रयोग)।


8. एडवर्ड ली थार्नडाइक (Edward Lee Thorndike)

सिद्धांत का नाम: प्रयास एवं त्रुटि का सिद्धांत / उद्दीपक-अनुक्रिया सिद्धांत (Trial and Error Theory / S-R Theory)


मुख्य बिंदु: इन्होंने सीखने के मुख्य 3 नियम दिए:


तत्परता का नियम (Law of Readiness)


अभ्यास का नियम (Law of Exercise)


प्रभाव का नियम (Law of Effect)


9. अल्बर्ट बांडुरा (Albert Bandura)

सिद्धांत का नाम: सामाजिक अधिगम सिद्धांत (Social Learning Theory)


मुख्य बिंदु: बच्चे दूसरों के व्यवहार को देखकर और उनका अनुकरण (Modeling) करके सीखते हैं। (बोबो डॉल प्रयोग)।


10. एरिक एरिक्सन (Erik Erikson)

सिद्धांत का नाम: मनो-सामाजिक विकास का सिद्धांत (Psychosocial Development Theory)


मुख्य बिंदु: इन्होंने पूरे जीवनकाल को 8 अवस्थाओं में बांटा है, जिसमें पहचान का संकट (Identity Crisis) सबसे प्रमुख है।


लॉरेंस कोहलबर्ग के नैतिक विकास के सिद्धांत में 'हिंज़ की दुविधा' (Heinz Dilemma) सबसे प्रसिद्ध कहानी है, जिसका उपयोग उन्होंने बच्चों और वयस्कों के नैतिक तर्क को समझने के लिए किया था। 


हिंज़ की कहानी (The Story of Heinz)


यूरोप में हिंज़ (Heinz) नाम का एक व्यक्ति रहता था। उसकी पत्नी कैंसर जैसी एक गंभीर और जानलेवा बीमारी से पीड़ित थी। डॉक्टरों के अनुसार, शहर के एक फार्मासिस्ट (दवा विक्रेता) द्वारा खोजी गई एक विशेष दवा ही उसकी पत्नी की जान बचा सकती थी। 


दवा विक्रेता ने वह दवा $200 में बनाई थी, लेकिन वह उसे बनाने की लागत से 10 गुना अधिक कीमत यानी $2,000 में बेच रहा था। हिंज़ बहुत गरीब था। उसने अपने दोस्तों, रिश्तेदारों और सभी परिचितों से पैसे उधार मांगे, लेकिन वह केवल $1,000 ही जुटा सका, जो कि दवा की कीमत का आधा था। 


हिंज़ दवा विक्रेता के पास गया और गिड़गिड़ाते हुए कहा, "मेरी पत्नी मरने की कगार पर है, कृपया मुझे यह दवा सस्ती दे दो या बाकी के पैसे मैं बाद में चुका दूँगा।" लेकिन दवा विक्रेता ने साफ़ मना कर दिया और कहा, "नहीं, मैंने इस दवा की खोज पैसे कमाने और मुनाफ़ा कमाने के लिए की है।" 


अपनी पत्नी को मरता हुआ देख हिंज़ पूरी तरह हताश हो गया। रात के अंधेरे में उसने दवा विक्रेता की दुकान का ताला तोड़ा और अपनी पत्नी की जान बचाने के लिए दवा चुरा ली। 


इस प्रसिद्ध कहानी के माध्यम से कोहलबर्ग ने बच्चों के सामने नैतिक दुविधाएं प्रस्तुत कीं, जिसे आप इस वीडियो के माध्यम से और बेहतर तरीके से समझ सकते हैं:



कोहलबर्ग द्वारा पूछे गए प्रश्न


इस कहानी को सुनाने के बाद, लॉरेंस कोहलबर्ग ने अलग-अलग उम्र के बच्चों से कुछ नैतिक सवाल पूछे, जैसे: 


क्या हिंज़ को दवा चुरानी चाहिए थी?


क्या चोरी करना सही है या गलत?


यदि हिंज़ अपनी पत्नी से प्यार नहीं करता, तो क्या तब भी उसे चोरी करनी चाहिए थी?


क्या दवा विक्रेता को इतनी महंगी दवा बेचने का अधिकार था? 


कहानी का निष्कर्ष और महत्व


कोहलबर्ग के लिए यह मायने नहीं रखता था कि बच्चे हिंज़ के कदम को सही बोलते हैं या गलत, बल्कि उनके लिए उत्तर के पीछे दिया गया तर्क (Reasoning) महत्वपूर्ण था। बच्चों से मिले विभिन्न उत्तरों के आधार पर ही कोहलबर्ग ने नैतिक विकास के 3 स्तर (Levels) और 6 चरण (Stages) निर्धारित किए: 


छोटे बच्चे (Pre-Conventional Level): उन्होंने कहा कि चोरी गलत है क्योंकि हिंज़ को पुलिस पकड़ लेगी और सजा मिलेगी। (दंड और आज्ञाकारिता) 


मध्यम उम्र के बच्चे (Conventional Level): उन्होंने माना कि समाज के नियमों को बनाए रखना जरूरी है, या फिर हिंज़ ने एक अच्छे पति का धर्म निभाया। (कानून व्यवस्था/अच्छा लड़का-अच्छी लड़की) 


बड़े लोग (Post-Conventional Level): उन्होंने तर्क दिया कि किसी मनुष्य की जान बचाना, कानून के नियमों और किसी के मुनाफ़े से कहीं ज्यादा बड़ा और महत्वपूर्ण मूल्य है।



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